नेपाल की चिंताओं को दूर करने के लिए दोनों देशों ने प्रख्यात व्यक्तियों का समूह (EPG- 'एमिनेंट पर्सन्स ग्रुप) बनाया था। इसने कई साल पहले ही संधि में संशोधन की सिफारिशों वाली एक रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया था लेकिन भारतीय नेतृत्व की तरफ से उसे स्वीकार नहीं किया गया है।
काठमांडू/नई दिल्ली: नेपाल की नई बालेन्द्र शाह ऊर्फ बालेन शाह की सरकार ने बेहद खामोशी के साथ तेजी से काम करना शुरू कर दिया है। खुद प्रधानमंत्री बालेन शाह चुपचाप काम कर रहे हैं और करीब एक महीने के कार्यकाल के दौरान उन्होंने ना तो जनता को संबोधित किया है, ना मीडिया से बात की है और ना ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से ही कोई ऐलान किया है। इसका मतलब है कि वो शोर शराबे से दूर ठोस काम करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। पिछले एक महीने में जो सवाल सबसे ज्यादा उठे हैं वो ये कि नेपाल की विदेश नीति क्या होगी?
बालेन शाह एक नये प्रधानमंत्री हैं और उनकी विदेश नीति क्या होगी ये सिर्फ अनुमान है। नेपाल, भारत चीन बांग्लादेश भूटान और पाकिस्तान का पड़ोसी है इसलिए इसका रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है। इसीलिए चीन यहां अपने पैर पसारने के लिए हाथ पैर मारता रहा है, अमेरिका दशकों से अपना दबदबा बनाने की कोशिश करता रहा है और भारत को नेपाल में चीन और अमेरिका की मौजूदगी असहज करता रहा है। नेपाल में कम से कम पिछले 8-10 सालों से एक आवाज जो उठी है वो है 1950 के उस समझौते को रीसेट करने की जिसके तहत 'इंडो-नेपाल ट्रीटी ऑफ पीस एंड फ्राइंडशिप' के साथ दोनों देशों के संबंध की नींव रखी गई थी।
बालेन शाह की सरकार बनने के बाद एक बार फिर से इस ट्रीटी को रीसेट करने की मांग की जा रही है। नेपाल के कई लोगों ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस ट्रीटी के बारे में लिखा है। लिहाजा जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर ये समझौता क्या है, इसपर नेपाल के नेता क्यों सवाल उठाते रहे हैं और भारत का इस समझौते को लेकर क्या स्टैंड रहा है?
नेपाल के कई नेता कर चुके इस समझौते को रीसेट करने की मांग
पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने 2008 में प्रधानमंत्री बनने के बाद इस संधि को खत्म करने की मांग की थी।
प्रचंड ने 2022 में अपने दिल्ली दौरे के दौरान भी इस संधि में संशोधन की मांग की थी।
उन्होंने जुलाई 2022 में अपनी भारत यात्रा के दौरान भी इस संधि की समीक्षा करने और ईपीजी (EPG) रिपोर्ट को स्वीकार करने पर जोर दिया था।
पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने 2018 के चुनावों के दौरान इस संधि को नेपाल के लिए "असमान" बताया था।
डॉ. बाबूराम भट्टराई ने भी 1950 की संधि सहित सभी "असमान संधियों" को रद्द करने और पंचशील के सिद्धांतों के आधार पर नए संबंधों की वकालत की थी।
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री कीर्ति निधि बिष्ट ने 1969 में इस संधि को "पुराना और अप्रचलित" करार दिया था।
नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री कमल थापा ने भी 1950 में किए गये इस संधि में संशोधन की मांग की थी।
भारत और नेपाल दोनों 2014 में संधि की "समीक्षा" और "समायोजन" करने पर सहमत हुए थे लेकिन अभी तक आधिकारिक तौर पर इस संधि में संशोधन नहीं हुआ है। बालेन शाह बतौर प्रधानमंत्री कुछ महीनों में भारत की यात्रा करने वाले हैं और इस दौरान भारत के साथ एजेंडे में कई तरह के मुद्दे शामिल है। इस दौरान कुछ मतभेद और कुछ विवाद के विषय भी हैं। इसीलिए माना जा रहा है कि अब जब नेपाल में एक भारी बहुमत वाली सरकार सत्ता में आ गई है तो 1950 की 'शांति और मैत्री संधि' और सीमा विवाद जैसे मुद्दों पर चर्चा शुरू की जा सकती है।
नेपाल के साथ संधि पर भारत की सोच क्या रही है?
दिल्ली के जवाहरलाल यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की प्रोफेसर अंशु जोशी से नवभारत टाइम्स ने इस संधि पर बात की। उन्होंने एनबीटी ऑनलाइन को बताया "भारत और नेपाल के बीच 1950 में ये समझौता किया गया था और ये संधि दोनों देशों की सीमा सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा पर आधारित थी। लेकिन तब से लेकर आज तक की परिस्थितियों को देखें और अभी तक की रिश्तों की यात्रा को देखें तो नेपाल के रणनीतिक लोकेशन और नेपाल के शासकों को देखें तो ये संधि बहुत महत्वपूर्ण रहा है। भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है और नेपाल के जहां तक हथियारों के आयात की बात है तो भारत की 'स्वीकृति' या 'पारदर्शिता' की एक बिंदू है। भारत के लिए महत्वपूर्ण ये रहा है कि नेपाल हथियारों का हब नहीं बन जाए जहां से हथियारों की कालाबाजारी हो या आतंकवाद को बढ़ावा मिले। इसीलिए इस बिंदू को इस संधि में रखने का मकसद भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी थी।"
भारत के नेपाल में राजदूत रह चुके रंजीत रे ने डेक्कन हेराल्ड में लिखा है 'भारत के लिए सबसे बढ़कर नेपाल के नए नेतृत्व के साथ आपसी विश्वास और समझ का एक सौहार्दपूर्ण रिश्ता बनाना बेहद जरूरी है। इस दिशा में कुछ प्रगति पहले ही हो चुकी है।' प्रधानमंत्री मोदी ने बालेन शाह को जीत की बधाई देते हुए उन्हें भारत आने का न्योता दिया और अगले महीने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री काठमांडू जा रहे हैं जहां वो आधिकारिक तौर पर बालेन शाह को नई दिल्ली आने का न्योता देंगे। इससे पहले दोनों देश बालेन शाह के दौरे को लेकर एजेंडा तय कर रहे हैं।
भारत को नेपाल से बनाना चाहिए सौहार्दपूर्ण रिश्ते
रंजीत रे ने लिखा है भारत और नेपाल के लिए "विदेश मंत्रियों के स्तर पर 'संयुक्त आयोग' की बैठक आयोजित करना महत्वपूर्ण है। राजनीतिक स्तर पर समय-समय पर समीक्षा करना और उसके बाद द्विपक्षीय परियोजनाओं की नियमित रूप से संयुक्त निगरानी करना, बेहतर क्रियान्वयन और कार्यकुशलता के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन तंत्रों को और ज्यादा मजबूत किए जाने की आवश्यकता है और द्विपक्षीय संबंधों में आने वाले उतार-चढ़ावों का इन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। जलविद्युत सहयोग के क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। 6,000 मेगावाट की विशाल और बहुउद्देशीय 'पंचेश्वर परियोजना' पर शीघ्र सहमति बन जाने से दोनों देशों के संबंधों में एक युगांतकारी परिवर्तन आएगा।" इसीलिए सवाल ये है कि अगर बालेन शाह का नेपाल 1950 में किए गये उस संधि में संशोधन की मांग करता है तो भारत क्या करेगा?